Posted by: Prem Piyush | May 29, 2007

सेल्समेन


आज मेरे लिए हजार रुपये खर्च करना कितना महत्व रखता है , शाय़द ठीक से पता नहीं, पर उन दिनों हजार रुपये कमाना कुछ जायदा ही मायने रखता था । दीदी की शादी के आसपास, घर की आर्थिक हालत बहुत अच्छी नहीं थी । और हम दोनों भाईयों के पढ़ाई का खर्चा, हमारे लिए नये कंप्युटर, आदि – आदि । और छोटी बहन की पढ़ाई चल ही रही थी और उसकी शादी के लिए थोड़ी-बहूत फिक्सड डिपोजिट को निकालना बाबूजी और माँ जैसे सरकारी कर्मचारियों के लिए मुश्किल सा था । पर हिसाब से चलना अब भी मुझे सीखना है, सच पुछिये तो आज इतना कमाकर भी मेरा हिसाब डाँवाडोल हो जाता है ।

हाँ तो सुनाते हैं, सेल्समेन की कहानी – बिना किसी भी फिक्शन के, कुछ बीती बातें जो मुझे याद आती है । या यूं कहें तो अच्छा रहेगा – एक सेल्सवुमेन की कहानी ।

आर्थिक तंगी के उन दिनों मेरे मौसेरे भाई ने सिलीगुड़ी से आते समय माँ को दिखा दिया कुछ स्कीम – नेटवर्किंग मार्केटिंग का – मोदीकेयर । साबुन, टुथपेस्ट से लेकर बच्चों के खिलौने तक सब कुछ बेचकर फायदा कमाया जा सकता था । मुनाफा करीब 15 प्रतिशत । आधा या पुरा पता नहीं कितना सोचा माँ ने, प र कुछ सोचकर ही करीब 3 हजार रुपये देकर माँ ले ली एक एजेंसी – घर-घर घुमकर बेचने के लिए । साथ में खरीदा माल करीब 2 हजार रुपये का ।

मैं सिलीगुड़ी मे पढ़ता था उस समय । सिलीगुड़ी से हरेक महीने मैं उनका माल ले आता था । हरेक महीने जब घर आता था तब सुनता वह कैसे किनके यहाँ- क्या बेच रही है । सबसे ज्यादा बिकती थी – टुथपेस्ट । करीब 56 रुपये का 100 ग्राम । ग्राहक से कहना पड़ता था – थोड़ा से ही काम चल जाता था । और दूसरी और महंगी थी पर बिकती थी – टी ट्री आयल और मास्चराजिंग क्रीम – चेहरे की धब्बे को ठीक करने के लिए । खरीद लेती थी – घरेलु औरेंते भी – अपने बचत के पैसे से ।

“दीदी जी इसबार 3 सौ रखिये ना – अगले महीने सौ रुपये दे दूँगी ।” और हाँ वह आँटीजी दुआएँ देती रहती माँ को – उसके चेहरे के काले धब्बे पता नहीं – महंगे प्रसाधन व्यवहार से या कुछ खुद के ख्याल रखने से साफ हो रहे थे ।

शाम को कई दिन बेचकर मुहल्ले की ग्राहकों से गपशप करके वह करीब सात बजे घर आती थी । एक रात जब मैं उनकी अनबिकी समानों को देख रहा था – देखा बार-बार पैकेट खोलते बंद करते टी ट्री आयल और मास्चराजिंग क्रीम का पैकेट पुरानी सी लग रही थी । कई पैकेट बिक गये थे पर शायद पुरानी सी पैकेट लगने के कारण उसे कोई खरीदता भी नहीं होगा । सर उठाकर देखता तो दिखती – उनकी अनबिकी चिन्ताएँ चेहरे पर, गाल पर काले से धब्बे बन आए थे । उस समय हजारों रुपये के बेतन मिलते थे पर उन्होनें सौ रुपये की भी शायद क्रीम कभी खरीदी होगी खुद से – पता नहीं । कंजुसी नहीं – पर उसी बचत के पैसों से सब कुछ – सिर छिपाने लायक एक मकान, पेट भरने लायक खेती की जमीन – और कहना चाहूँगा कि सबको तैयार करने में बाबुजी की बराबर की हिस्सेदारी । जब क्रीम की बात आयी तो कह ही दूँ कि मेरी दीदी और बहन को शहनाज हूसैन की क्रीम ही सुट करता था – और वे उस समय बचत करके, बाबुजी का खुशामद करके भी पैसों का जुगार कर भी लेती थी ।

पर उस दिन न कमानेवाले मुझ बेटे की हिम्मत नहीं होती कि कहूँ – “माँ तुम खुद के लिए एक मोदीकेयर वाला स्कीन क्रीम युज क्यों नहीं करती” । पर उस रात मेरा मन नहीं माना – अपने तरीके से कह ही दिया – “माँ इतना महँगा क्रीम ऐसे पुराने पैकेट मैं कौन खरीदेगा ? और देखो ना – इसका ढक्कन का स्टीकर भी फट सा रहा हैं । और कई महीने में इसका इफ्फेक्ट भी कम हो जाएगा – फिर खरीदने वाले को भी फायदा नहीं होगा । जब लोगों को फायदा होता है तो आप भी ये वाला युज करके देखो ना – आपको भी चेहरे के लिए कुछ चाहिए ना ।”

सच पुछिये तो सबको उस क्रीम का गुण बताते-बताते मन तो उनका भी करता होगा कि एक बार वह भी इस्तेमाल करे । पर डब्बेवाली “अफगान क्रीम” लगाकर पली-बढ़ी मेरी माँ की इतनी हिम्मत न हो पाती 400 रुपये वाली क्रीम की – जो बात हम दोनों समझते थे ।

हरेक महीने सामान बेचकर फायदा करीब आठ सौ – हजार रुपये की हो जाती थी । कहती थी – सब्जी का तो खर्च निकल आता है ना ।

छोटे शहरों में बिक्री के लिए ट्राई करने के लिए जो भी खरीदे – सब नहीं बिकती थी । नहीं बिकी – उनकी रेजर सेट – तो मुझे देने लगी । नहीं बिकी उनकी किताबों की सेट – नहीं बिकी उनकी महँगी नेलपालिश की रेंज और कुछ साफ्ट टाएज खिलौने । एक रैबिट वाला साफ्ट टाए तो अभी तक पैकेट में ही है – कहती है – पोते को देगी । स्कुल के बाद शाम को और रविवार की शाम – करीब 4 से 5 किलो बजन का बैग लेकर घर-घर घुमती – पैसों के लिए और हाँ उसे शायद ऐसा करके संतोष भी होती । उनकी परेशानी और होने वाली आय को देखकर बाबुजी मना करते रहते – पर पता नहीं क्या-क्या करना चाहती – मेरी माँ । वैसे उनके बैग में भी एक दुकान था – आफिस और स्कुल की मैडमों जैसी कई नियमित खरीददार थी उसकी ।

एक बार करीब सप्ताह भर की छुट्टियों में मैं घर पर था । वैसे कई बार मैनें भी उनसे कहा कि “माँ कुछ समान दो – मैं बेच आता हूँ “। पर मेरे साथ सबसे बड़ी परेशानी थी कि बाहर पढ़ाई-लिखाई होने से अपने मुहल्ले से बाहर ज्यादा लोग मुझे जानते भी नहीं । पर मेरी इच्छा को देखकर माँ ने कह दिया कि -“अच्छा बगल के आजाद पब्लिक स्कुल में प्रिसिंपल ने रुचि दिखाई थी – उनके मैडम ने कुछ सामान खरीदी भी थी – उनके पास कुछ सामान दिखा आओ। होस्टल के बच्चों के लिए कुछ पेंटिंग की किताब ले लो । “

नास्ता करके समान उनके कंपनी वाले बैग भरकर मैं चल दिया । रविवार का था वह दिन । वहाँ प्रिसिंपल की उम्र करीब रही होगी कोई 35 साल । साथ मे थे भाइस-प्रिसिंपल । मैनें अपना परिचय दिया – “दीदी जी जो उस दिन आयी थी – कुछ समान दिखाने – मैं उनका बेटा हूँ ।” मैं दिखाने लगा हैडवास लिक्विड से लेकर बाडी स्क्रबर और आफ्टर सेव लोशन और एडुकेशेनल कैसेट ।

पता नहीं कैसे सीखा – पर मुझे प्रोडक्ट समझाना आता है । अंदाजा लगाया उनकी जरुरतों को जानने का । समझाया उनको जैसे कि ये सारे उनके अपने ही समान हैं । भाई साहब कुछ सामान लेकर बेगम को दिखाने घर में ले गये । उनका परिवार वहीं कैंपस में रहता था । करीब छः सौ रुपये के सामान खरीदे दोनों ने मिलकर । अदाजा नहीं था कि इतना खरीद लेंगे – पर मेरे लिए उस समय भगवान से कहीं कम नहीं थे वे ।

भाइस – प्रिसिंपल ने पुछ ही डाला – “अच्छा भाई साहब आप वैसे क्या करते है ?”

” एम सी ए में पढ़ता हूँ । “

“तो फिर यह सब …. ?”

“बस इगेंजमेंट, और आपकी सेवा । “

वे हँसने लगे । भाइस – प्रिसिंपल जो अलिगढ़ युनिभर्सिटी से इंजिनियरिंग करके शिक्षण में समर्पित थे – मेरे अब मित्र बन गये ।

“एम बी ए कर लें – आपके लिए सुट करेगा ” – वो राय दे रहे थे ।

पर इधर मेरा भार कम नहीं हो रहा था बैग का – बिन बिके किताबों के चलते । पिसिंपल साहब बच्चों के लिए नहीं खरीद पायेंगे – पेटिंग की किताबें – 20 – 30 और 50 रुपये वाली – फंड नहीं हैं उतने उनकी । पर अनुमति मिल गयी – बच्चों से मिलने की – अगर वो खरीद सकें खुद से ।

मैं बैग लेकर हास्टल के बरामदे में पैर लटकाकर बैठ गया । नये स्कुल के हास्टल में उस समय करीब 50 बच्चें रहे होगें । रंगीन पेंटिंग के किताब ले-लेकर बच्चे देखने लगे । आज भी नहीं भुल पाता हूँ की “अलादीन” की पेंटिंग किताबें सबको पसंद थे । एक गोरा बच्चा – अच्छे घर का लगता था – ने खरीदी एक 50 रुपये की किताब । वैसै बच्चों की भीड़ देखकर सोचा कि कम से कम दस तो बिकेंगे ही । पर खरीदने वाले कुल बच्चे थे – सिर्फ तीन । तिस पर भी एक बच्चे के दो रुपये कम हो रहे थे ।

बच्चों नें बताया कि उनके अभिभावक इधर बहुत दिनों से नहीं आये थे । 30 तारीख को आयेंगे सबके अभिभावक – उस दिन छुट्टी होने वाली है । सबके मुँह से एक ही बात – अंकल आप 30 को आईए ना – मेरे अब्बा आयेंगे – मेरे पापा आयेंगे । मेरे भैया आऐंगे – मैं पजल वाली बुक खरीदूँगा । और उनके हास्टल में ज्यादा पैसे भी रखने नहीं दिये जाते हैं । जो कुछ था – खर्चा हो गया था सबका।

किताबों को हाथों में पकड़े हूए, उन लोगों का चेहरा देखकर मन तो करता था कि – सब किताबें उनकों दे आऊँ – बाद में आकर पैसे ले लुँगा । पर नहीं खरीदने वाले बच्चों से एक – एक करके किताब लेकर मै बैग में डाल लिया – किताबें नहीं बिकी फिर । मैं वापस चल पड़ा घर की ओर ।

घर पहूँचकर माँ को हिसाब दे दिया – बता दिया कि 30 को बच्चे फिर बुला रहे हैं । 30 तारीख तक मुझे घर पे रहना था । करीब 4 सौ रुपये की किताबें होगी – जो बेचनी थी हमें । बीच में प्रिसिंपल सर की मैडम को एक क्रीम भी दे आयी था मैं । उस दिन फिर बच्चों ने मुझे पहचान लिया और घेर लिया और सबने फिर याद दिलाया कि – 30 तारीख को आईएगा अंकल ।

इधर घर पर हम लोग आपस मे मिला चुके थे कि मैं घर पे ना भी रहूं तो माँ किताबें बेच आएगी उस दिन वहाँ ।

घर पर उस समय कुछ जरुरी काम चल रहे थे और एक शाम हम लोग बरामदे में बैठे थे और याद आयी किताबों को बेचने की बात । मैनें माँ से पुछा – “माँ… आज तारीख क्या है !”

और हम दोनों एक दुसरे को देख रहे थे । वह 30 तारीख की शाम थी । बाहर अँधेरा होने वाला था ।

हम दोनों बरामदे से उठकर घर में आ गये । रैक पर रखी हूई थी – किताबों का अलग से रखा गया पैकेट जो हमने उस दिन के लिए अलग से बाँधकर रखा था । हमें दुख नहीं था कि हमारी किताब नहीं बिकी ।

आज हम दोनों चुपचाप से थे कि आज बच्चों की छुट्टी हो गयी । आज सुबह से सब आस लगाकर बैठे रहे होंगे । इतने दिन से आशा लगाकर आज बिना किताब खरीदे ही घर चले गये होगें ।

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Responses

  1. You should not have forget.

    Bechare bacche intezar kar kar ke thak gaye honge… might they thought all elders are liyer

  2. In fact I was waiting for your comment.
    Yeah. You are correct.
    Afterwards we did not sold the books, rather distributed them as prizes in the local function.


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