Posted by: Prem Piyush | February 21, 2007

मैं पत्थर नहीं, माटी हूँ ।


मैं पत्थर नहीं, माटी हूँ,
मत बरसना, घनेरे बादल मुझपर,
नहीं झेल पाता, मैं तेज बरसात,
मैं तो बस बह जाता हूँ ।

मै पत्थर नहीं, माटी हूँ,
नहीं है, मेरा कोई अस्थित्व,
बस धुल हैं मेरे संगी ।
सबकी चरणों के नीचे ।

मुझे तो उसने बनाया,
अंदर से ढेर सा प्यार और,
उपर से, सिर्फ उसकी थपकी ।
थोड़े-थोड़े पानी से बनाया,
उस तपती दुपहरिया में,
कुम्हार के चाक ने ।

मेरी ईच्छा नहीं रही कभी,
कि पूजा जाऊँ, पत्थर की तरह,
मेरी ईच्छा नहीं रही कभी,
कि देवमूर्ति में ढाला जाऊँ ।

मेरी तो ईच्छा रही की,
उन बच्चों का खिलौना बन जाऊँ,
बस खेल कर, उसी निर्मल प्यार से,
उन्हीं से टुटकर, मैं माटी बन जाऊँ ।

मैं पत्थर नहीं, माटी हूँ ।

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Responses

  1. As usual beautiful..

    I like the ending very much….

  2. Hope you remember my poem Patthar hoon main…

    Kya uska jawab hai ye 😛

  3. Thank you for liking it.

    Pathar ka jawab mati…oh no, its mere coincidence only :). Yeh to bawra man ka mati dhul hai 🙂


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