Posted by: Prem Piyush | January 6, 2007

इतनी जल्दी भी क्या है !


आज मिल रही थी, दोनों की नजरें,
आपस में फिर कुछ शरारतें करती,
झुक जाती फिर प्रिया की अंखियाँ ।
उसकी नादानी से शिकायत करती,
ज्यों कहती – इतनी जल्दी भी क्या है !

सुनहरे बालों पर सरकते हाथ,
लटों से उलझती थी अंगुलियाँ ।
पुछ बैठा आज एक प्रश्न वह,
फिर कुछ उत्तर न दे पाती थी,
पर पुछती – इतनी जल्दी भी क्या है !

आज कानों के पास उसके होंठ,
कहा ज्यों धीरे से फिर वही कुछ ।
अब दूर कर दी उसने चेहरे को,
नाक पकड़कर समझाती उसको,
मुस्कुराती बोली – इतनी जल्दी भी क्या है !

आज छुआ भर ही था उसने,
उसके भींगे गुलाबी होठों को,
गोरी अंगुलियों ने रोक लिया ।
शरारती अंगुलियों को चुमकर कहती,
हँस पड़ी – अरे, इतनी जल्दी भी क्या है !

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Responses

  1. What’s the matter. Bahut romantic shomatic poem likh raho aap 🙂


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