Posted by: Prem Piyush | December 26, 2006

जब कल तुम भी चुप थे ।


सुनाई देती, तुम्हारी धड़कन ।
तेरे भींगे होंठ, चुप्पी साधे ।
गालों पर दो नन्हें आँसु ।
जब कल तुम भी चुप थे ।

गा रही थी, कोयल वहाँ और ,
तुमने ढँक रखे थे कान,
फिर
भी कूक सुनाई देती ।
जब कल तुम भी चुप थे ।

बोल रही थी, तेरी आँखे,
पुछती थी, मुझसे फिर कुछ ।
मेरी मौन उत्तर दे रही थी ।
जब कल तुम भी चुप थे ।

खेल रही थी, तेरी लटों से,
आवारा ठंडी पुरवैया हवाएँ ।
और मैं बस जल रहा था ।
जब कल तुम भी चुप थे ।

चुप सी थी, सारी दुनिया,
अपनी गति, अपने रास्ते ।
पर यह चुप्पी गुंज रही थी,
जब कल तुम भी चुप थे ।

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