Posted by: Prem Piyush | December 16, 2006

— कैसी हैं अँखियाँ रे तेरी —


I wrote this poem last year ,  just imagining my completely unknown beloved  who must be studying or doing a job at some place  at that moment. Ma got sentimental after reading it, looking into my aankhein. This was also published in Hindi blogger’s web magazine http://nirantar.org . 

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कैसी हैं अँखियाँ रे तेरी,
काली, नीली या भूरी रे ।

पहाङी, देशी या हिरणी सी,
स्नेह लबालब वे अँखियाँ रे ।

सीपियों बीच मोतियाँ जैसे,
इठलाती हुई पुतलियाँ रे ।

सुख के सपने बसाये हूए,
आसुँ न कोई उनमें भरना रे ।

विपदा अगर कोई आन पङे तो,
तुम ह्रदय की आँखें खोलना रे ।

बचाने के लिए बुरीं नजरें फिर,
नजरों में काजल तुम लगाना रे ।

हँसती अँखियाँ तुम खुब सबेरे,
प्यार की किरण छितराना रे ।

दीवारों की भी अँखियाँ होती,
तुम सोच-समझकर चलना रे ।

मुझसे अगर कोई भुल हो जाए,
आँखों की ही भाषा कहना रे ।

आँखे अगर थकीं होतीं हो तेरी,
वो फिर मुझको दे जाना रे ।

निंदियाँ रानी की प्यारी आँखे,
बंद करके तुम फिर सो जाना रे ।

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Responses

  1. Such a lovely poem. Loved each word.

    And you really have great Ma.


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