Posted by: Prem Piyush | November 29, 2006

सादे पन्ने


पड़ी हूई थी चिठ्ठियाँ
आलमारी के कोने में,
फेंका भी नहीं उन्हें ।
कभी दरवाजे खुलते,
देखा हँसते थे –
Blank Pages
अक्षर उनमें ।
पर वह न हँस पाता,
टपकती उसकी दो बुँदें,
आँसु की तब,
भींग जाती स्याह,
मिटने लगते अक्षर ।
मान न पाता,
बस खेल था वो ।
बंद कर आलमारी,
बैठ गया कुर्सी पर,
देखा तो वहीं,
कलम पड़ी थी
टेबुल पर और,
कागज के सादे पन्ने,
पर बढ़ते न थे,
हाथ उसके,
लिख न पाते,
अगर लिखा कुछ
इस पल,
जो बीत जाएगा,
रह जाएँगे लिखे पन्ने ।
जो उसे प्यारे थे, और
बन जाएगा इतिहास ।
और फेंक न सकेगा ।
फिर नहीं लिखा उसने-
पुचकारा वहाँ पड़े सादे पन्ने ,
जो कम से कम,
चुप तो रहते ।

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

Categories

%d bloggers like this: