Posted by: Prem Piyush | June 14, 2005

सोच-समझकर अब जीना है


हृदय के भाषा कैसे मैं जानूँ,
खुश हो तुम, कैसे मैं मानूँ ,
कैसे कहूँ, कैसे ये रैना बीती,
कैसे कहूँ वो हारी या जीती ।

सोच-समझकर अब जीना है।

चुप रहना ही ठीक था बंधु,
दिखता था हृदय तेरा सिंधु,
बस तभी तो मैंने गाया था,
विश्वास करो, न गाऊँगा अब ।

सोच-समझकर अब जीना है।

पता नहीं था वीणा के झंकार,
स्वरलिपि के वे सप्तक तार,
मंद्र सप्तक हो जाऐंगे तीव्र सप्तक ,
न अब वीणा है, न गाना है ।

सोच-समझकर अब जीना है।

पता नहीं क्यों ऐसा लगता,
एक भय का संदेशा फिर आता,
नदी मेरी नहीं, न मेरी धारा,
इसकी गति है, इसे बहना है।

सोच-समझकर अब जीना है।

भावों के धार में बहना नहीं,
सीख कठिन है अपनाना भी,
मनुजपुत्र को क्यों नैया खेना है,
डुब जाने से तो भला डरना है ।

सोच-समझकर अब जीना है।

अगर प्रेम की भाषा है अपराध,
हाँ , मैं चिर क्षम्य अपराधी हूँ,
कहूँ, यही मेरी एक अक्षुण्ण संपत्ति से,
असहायों के सुश्रुषा का व्रत पुरा करना है।

सोच-समझकर अब जीना है।

जीवन तो एक सीख है मित्र,
मरना भी कहाँ हमने सीखा है,
एक बात कहूँ, अगर मान लो तो,
पल-पल मरना कभी अच्छा नहीं ।

सोच-समझकर अब जीना है।

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