Posted by: Prem Piyush | February 23, 2005

बस ऐसा ही कुछ मै हूँ ।


बस ऐसा ही कुछ मैं हूँ ।

तेज हवाओं के थपेङो से
चोटिल हास्यालंकृत होकर,
धरती माँ के हरे आँचल पर
गिरकर शांत हो जाता हूँ ।

बस ऐसा ही कुछ मैं हूँ ।

श्यामल घटाओं के संघर्ष में
उलझे पतंगो के डोरों बीच,
टुट जाता है अंतिम तंतु जब
छोटी पतंग के सहारे उङता हूँ ।

बस ऐसा ही कुछ मैं हूँ ।

सुनामी की प्रचंड लहरों से
बालुका राशि से पदच्युत,
समंदर के असीम छाती पर
तिनके के सहारे बहता हूँ

बस ऐसा ही कुछ मैं हूँ ।

दशहरे के भीङ-भरे मेले में
शोर-संगीत, पुजा-अर्चना के बीच,
जब अनमोल बंधन जब टुट जाता है
फिर विश्वत बंधन में बंध जाता हूँ

बस ऐसा ही कुछ मैं हूँ ।

उन्हीं राहों के अनजान पथिक
जो साथ हँसते, गाते और रोते थे,
उनको खोने का दुःख तो होता है
फिर प्रेमवश सपनों मे मिल आता हूँ ।

बस ऐसा ही कुछ मैं हूँ ।

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